जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
जय काली और गौर देवी कृत सेवा।।
प्रभु जय भैरव देवा।।
तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिंधु तारक।
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक।।
जय भैरव देवा...वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी।
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी।।
जय भैरव देवा।।
तुम बिन देवा, सेवा सफल नहीं होवे।
चौमुख दीपक दर्शन से सब दुःख खोवे ॥
जय भैरव देवा।।
तेल चटकी दधि मिश्रित भाषावाली तेरी।
कृपा कीजिये भैरवजी, करिए नहीं देरी।।
जय भैरव देवा।।
पांव घुंघरू बाजत अरु डमरू दमकावत।
बटुकनाथ बन बालक जल मन हरषावत।
जय भैरव देवा।।
कालभैरवजी की आरती जो कोई जन गावे।
कहे धरनी धर मानुष मनवांछित फल पावे।।
जय भैरव देवा।।
भैरव आरती का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि भगवान भैरव को काल का स्वामी और काशी के रक्षक माना जाता है। वे भय, बाधा और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करते हैं। विशेषकर तंत्र साधना और शक्ति उपासना में भैरव जी की आराधना अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।
नियमित भैरव आरती करने से भय समाप्त होता है और आत्मबल बढ़ता है। शत्रु बाधा, न्याय संबंधी परेशानियाँ और अचानक आने वाले संकटों से रक्षा मिलती है। मानसिक दृढ़ता और निर्णय क्षमता मजबूत होती है। घर और कार्यक्षेत्र में सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
रविवार, मंगलवार या कालाष्टमी के दिन प्रातः या रात्रि में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भैरव जी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक, धूप, लाल फूल और प्रसाद अर्पित करें। सरसों का तेल और काली उड़द चढ़ाना शुभ माना जाता है। श्रद्धा और एकाग्रता से आरती करें तथा अंत में प्रसाद वितरित करें।
भैरव आरती भक्ति, निर्भयता और सुरक्षा का प्रतीक है। श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई आरती जीवन के संकटों को दूर कर स्थिरता और शक्ति प्रदान करती है।
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